हरिया के भुत की कहानी , जिससे पता चलता है कि हर भुत का मकसद बुरा नही होता The Friendly Ghost Story of Hariya

The Friendly Ghost Story of Hariya

The Friendly Ghost Story of Hariyaमित्रो मेरा नाम अरविंद दीवान है। में बी॰ ए॰ तक पढ़ा हूँ, और में महाराष्ट्र का रहने वाला हूँ। स्वभाव से काफी मिलनसार होने की वजह से में काफी जल्दी दोस्त बना लेता हूँ। फ़ेसबूक पर मिले एक दोस्त ने मुजे गुजरात घूमने आने की सलाह दी। वैसे तो में घूमने फिरने कम ही जाता हूँ, पर गुजरात, का पोरबंदर शहर गांधी जन्म भूमि कही जाती है, इस लिए मेने सोचा की चलो कुछ दिन चला जाता हूँ। मेंने सोचा नहीं था की मेरी छुट्टीयां इतनी भयानक बीतेंगी। आज भी में उस खाकी कपड़े पहने हुए भूत के बारे में सोचता हूँ, तो डर के मारे मेरी चीख निकल आती है।

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पोरबंदर में मेरे नए दोस्त रवि ने रेल्वे स्टेशन के पास अपने घर में ही मुजे रहने की जगह दी। 10 दिन की छुट्टीयां मेंने चौपाटी, कीर्तिमंदिर, कमलाबाग, हरीमंदिर, भारत मंदिर, और तारा मंदिर देख कर बिताने का फैसला किया। रवि नौकरी करता था, इसलिए उसके पिता को        दोपहर का खाना पहुचाने  में मैंने मदद करने का फेसला किया। दोस्त के पिता की यह मदद मुझे भारी पड़ गयी।

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मै जंक्शन रोड से दोपहर में टिफिन ले कर पैदल जा रहा था। अचानक मेरी नज़र दायी और खड़े खाखी कपड़ो वाले इन्सान पर गई | मुझे लगा कि वह रेल्वे का कर्मचारी होगा। मेंने उसे देख सिर हिलाया, उसने भी सिर हिलाया। पर मै जैसे ही आगे बढ़ा वो भी रेल की पटरी के साथ आगे चलने लगा। अब मेरे पसीने छूटने लगे क्यूँ की मुजे लगा की यां तो ये सनकी पागल है या मुजे मार के लूटने वाला है।

मैंने अपनी गति बढ़ा दी। वह भी मेरे साथ साथ दौड़ने लगा। दौड़ते दौड़ते उसने अचानक एक पत्थर उठा लिया, और उसके दूसरे हाथ में पहले से एक लकड़ी की छड़ी थी। झुकते  वक्त उसकी पीठ मेरी और हुई और मेंने देखा उसकी पीठ पर मांस के लोथड़े लटक रहे थे। और उसकी पीठ के निचले हिस्से से बे-तहाशा खून टपक रहा था। अब में समझ चुका था की मेरा पाला किस मुसीबत से है। हम दोनों भाग रहे थे। अचानक ट्रेन की आवाज-(विसल) बजी। और …..

और सिटी बजते ही… जो वह आदमी चिल्लाया…मुझ पर… “मेरे तो रोंगटे खड़े हो गए।“ और मै तो बिना सोचे समझे टिफिन फेंक कर जोर से भागा, मेरी चप्पल भी वहीं छूट गयी और कंकड़ पत्थर वाले रास्ते पर मै करीब 300 मीटर दौड़ कर हाइवे तक पहुचा |

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सन्नाटे और उस सनकी, से दूर आ कर लोगों की भीड़ देख कर मेरी जान में जान तो आई, पर में डर के मारे रो पड़ा। और मेरी साँसे इतनी तेज थीं की में वहीं हाइवे पर थक कर बैठ गया। मुजे रोता हुआ देख लोग जमा हो गए, और मेरे जेब से फोन निकाल कर मेरे दोस्त को लोगोने वहाँ बुलाया, मेरा दोस्त मुजे रिक्शे में डाल कर अपने घर ले गया।

मेरे दोस्त रवि के पिताजी ने मुजे उस रेल्वे पटरीयों के पास भटकते हरिया नाम के भूत की दुर्घटना वाली कहानी बताई। उनके कहे अनुसार हरिया एक रेल्वे कर्मचारी था। हरिया का काम ट्रेन की पटरियों को दुरुस्त करना, और जानवरों को रेल पटरियों से दूर हांकना था। हरिया अपना काम बड़ी शिद्दत से करता था।

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एक दिन रेल्वे की पटरी की दरार में गाय का पैर फंसा देख हरिया पटरी की और भागा। और ज़ोर लगा कर गाय का पैर निकाल ने लगा और उसी वक्त अचानक ट्रेन आने लगी। काफी मशक्कत के बाद हरिया ने गाय का पैर तो निकाल लिया, पर ट्रेन की आवाज से डरे और फसे जानवर (गाय) ने अपने सींगों से हरिया को उछाल कर पटरी पर फेंफ दिया। और हरिया की पीठ पर से ट्रेन गुज़र गयी। हरिया ने वहीं दम तौड दिया।

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दुर्भाग्य वश सामने की और प्लेटफॉर्म पर खड़े लोग यह करुण दृश्य देख ने के अलावा कुछ कर पाते, उतने में यह सारी घटना घट गयी।
“शायद इसी वजह से हरिया ट्रेन की पटरियों के पास से गुजरने वाले हर व्यक्तियों को आज भी पटरीयों से दूर भगाता है।“
“और कई बार दोपहर में जानवर उस जगह चिल्लाते सुने जाते है। शायद उन्हे भी डरा कर हरिया रेल पटरियों से दूर भगाना चाहता है, ताकि किसी का अंजाम खुद के जैसा भयानक ना हों”

दस दिन की छुट्टियाँ मेंने चार दिन में खतम की, और ट्रेन की वजाय बस से वापीस महाराष्ट्रा लौट आया। हरिया का भूत शायद नेक इरादे से लोगो को डराता होगा पर उसे देखने का मेरा अनुभव मुजे आज भी आतंकित करता है। “गांधी जन्म भूमि को मेरा दूर से सलाम”

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